Monday, May 23, 2011

झाँसी की रानी महारानी लक्ष्मीबाई



महारानी लक्ष्मी बाई एक ऐसी महारानी थी !
जो आज तक न तो इतिहास में हुई है और न कभी होगी!
आज आपको पेस है उनके जीवन के कुछ मह्त्वपूर्ण कार्य !
महारानी लक्ष्मी बाई का जन्म 19 नवम्बर 1835 को वाराणसी में हुआ था!इनके बचपन का नाम मनूबाई था सब प्यारसे इन्हें मनु कहा करते थे!पेशवा बाजीराव दुतीय ने उन्हें एक नाम और दे रखा था छबिली !उनके पिता का नाम मोरोपंत ताम्बे माता का नाम भागीरथी था !4 बर्ष की आयु में ही उन्हें माता के प्रेम से बंचित होना!उनके पिता को बाजिराव ने कानपूर के पास बिठुर बुला लिया यहाँ मनूबाई को पेशवा के पुत्र नाना साहब के साथ तलबार चलाना घुङसबारी आदि सीखने को मिला!उनका विवाह 13 बरस की आयु में झाँसी के महाराजा गंगाधरराव के साथ हुआ !सोलह बरस की आयु में बे माता बनी पुत्र का नाम दामोदर रखा गया !किन्तु शीघ॒ ही उस पुत्र दामोदर की मत्यु हो गयी! इस दुःख को महाराज सहन नहीं कर पाए और कहा जाता है पुत्र शोक में उनकी मौत हो गयी !तब उन्होंने एक पुत्र को गोद लिया उसका नाम भी दामोदर रखा!16 march 1854 में रानी को निर्बर मानकर तत्कालीन गबर्नर लार्ड डलहोजी ने झाँसी को हड़प निति के तहत ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने का निश्चय किया !तभी रानी ने चेतावनी देते हुए कहा में अपनी झाँसी नहीं दुगी ! सन॒ 1857को नाना साहब तात्या टोपे आदि के नेतृत्व में इस युद्ध की प्रस्थ्भूमि तैयार की गयी!अग्रेजो के साथ युद्ध सुनिश्चित था !नारियों के साथ सेना में पुरुष भी सामिल किये गए!
झाँसी के राज्य को सुचारू रूप से चालने के लिए दीवान रघुनाथ सिंह को सेनापति नियुक्त किया गया तोपों का दस्ता गॉस खान को सोपा गया भाऊ बख्सी को उनका सहयोगी बना या गया !मोतीबाई को जासूसी बिभाग सोपा गया!
मह्लायो की अश्वारोही सेना का नेतित्व अपनी कृपा पात्री सहेली झलकारी बाई को सोपा गया!बारूद बनाने के लिए कुसल आदमी बुलाए गए !कड़क बिजली व भबानी शंकर नाम की टॉप बनायीं गयी!आग्रेजो के साथ युद्ध करने के पूर्व उन्हें दो युद्ध और लड़ने थे !
पहला था गंगाधरराव के सम्बन्धी सदाशिव राव के साथ व दूसरा युद्ध ओरछा के दीवान नत्थे खान के साथ हुआ !
नत्थे खान ने बीस हज़ार की सेना लेकर झाँसी के मऊरानीपुर व बरुआ सागर पर आधिकार कर लिया उसने झाँसी के किले को चारो तरफ से घेर लिया व जमकर तोपों से प्रहार किया !खूब गोलाबारी हुई अंत में नत्थे खान प्राण बचाकर भागा !
21 march 1858 को ब्रिगेडियर स्टुमर्ट के सहयोग से सर ह्यूरोज़ ने झाँसी को घेर लिया बारह दिनों तक युद्ध चला!
राव दूल्हा जू देव व अली बहादुर जैसे देशद्रोहियों ने विशवास घात किया!राव दूल्हा जू देव ने आग्रेजो की मदद के लिए ओरछा दरवाज़ा खोल दिया!
इस युद्ध में बानपुर के राजा मर्दनसिंह तथा बांदा के नबाब ने झाँसी की सहयता की आग्रेजो ने रणनीति तैयार कर ली थी अब हार सुनिश्चित थी !तब रानी ने सब सहयोगियो को बुलाकर योजना तैयार की सबने यह निछ्चय किया की सुबह सभी मार काट करते हुए भाडेरी फाटक से शत्रुओ से अंत समय तक लड़ते हुए शत्रुओ से जुझेगे!सुबह रानी भान्देरी फाटक से कालपी पहुची कालपी से रानी ग्वालियर पहुची व ग्वालियर के किले पर आधिकार कर लिया!16 जून1858
को आग्रेजो ने वहाँ भी आक्रमण कर दिया!झाँसी की सेना को परास्त पडा! रानी का घोडा उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिया भागा पर आगे एक बरसाती नाला आ जाने के कारण रानी को रुकना पड़ा पर घोडा मारा गया!रानी की पसलियो में गोली लगी!एक गोरे की तलबार का भरपूर वार रानी के माथे व कंधे को चीड गया!उन्होंने आदेश दिया उनकी मृत देह आग्रेजो के हाथो न लगने पाए !व साधु गंगादास के हाथो गंगाजल पीकर देह विसर्जन किया!उनकी चिता को घास पर रखकर जला दिया गया!
उनके इस बलिदान पर हुरोज़ ने कहा था -सम्पूर्ण विश्व में रानी सबसे वीरांगना व कुशल महिला थी!उनके हाथ मखमली दास्तानो के भीतर उनकी उंगलिया फौलादी थी!
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3 comments:

upendra shukla said...
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RameshGhildiyal"Dhad" said...

Samraat ji, bada hi achha prayaas hai aapka aap ne desh ke gaurav maharaani ke jeevan ki kuchh ghatnaaen jo hamne padi nahi thi, vo hame bataai...aapke aabhari hain...aap isi tarah ki aur jaankaari uplabdh awashya karvaiyega...dhanywaad...

RameshGhildiyal"Dhad" said...

AApne aatankwaadi laaden ko badi ijjat bakshi hai apne lekh me ...aapko badhai..

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